उज्जैन मंदिर पार्किंग विवाद के बीच मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। बृहस्पतिवार को हाई कोर्ट ने निजी मंदिरों के प्रबंधन और मंदिर संपत्तियों में सरकारी हस्तक्षेप को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि निजी मंदिरों के संचालन, प्रबंधन और मालिकाना विवादों में सरकारी प्रशासन की कोई भूमिका नहीं होती। अदालत ने यह भी निर्देश दिए कि मंदिरों से जुड़ी जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में केवल देवता का नाम दर्ज किया जाए। कलेक्टर, पुजारी या किसी ट्रस्टी का नाम प्रबंधक के रूप में दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि संपत्ति का वास्तविक स्वामी देवता को माना जाएगा।

हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश जारी करते हुए कहा कि इस संबंध में सभी जिला कलेक्टरों को तुरंत निर्देश दिए जाएं। अदालत ने कहा कि मंदिरों की जमीन पर सरकार को नीलामी करने का अधिकार नहीं है। साथ ही पुजारी को संपत्ति का मालिक नहीं बल्कि केवल प्रबंधक माना जाएगा। यदि कोई व्यक्ति मंदिर की संपत्ति पर निजी हक जताने की कोशिश करता है, तो उसे कुप्रबंधन की श्रेणी में माना जाएगा।

जमीन के विवाद पर अहम फैसला

अदालत के इस फैसले को मंदिर संपत्तियों के संरक्षण और पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थाओं के लिए अहम माना जा रहा है। लंबे समय से मंदिरों की जमीनों पर अधिकार और प्रबंधन को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। कई मामलों में राजस्व रिकॉर्ड में पुजारी, ट्रस्टी या सरकारी अधिकारियों के नाम दर्ज होने से विवाद खड़े हुए थे।

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